बाल कहानियाँ (Children Story in hindi) | Panchtantra ..

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बाल कहानियाँ (Panchtantra Ki Kahani Story in Hindi)

यह कहानी उस समय की हैं जब सभी बन्दर जंगल को छोड़ कर शहर की ओर जा रहे थे। तभी सभी बन्दरो का सरदार बोला की शहर पहुंचते ही कोई भी बन्दर शैतानी नहीं करेगा, और सभी बन्दर शहर की ओर चल दिए, जब वे शहर के किनारे पहुंचे तो उन्होंने देखा की शहर में बड़ी-बड़ी इमारते बानी हुई थी ये सब नजारा देख कर वे चकित रहा गये और मन ही मन सोचने लगे की यह तो खूब मौज-मस्ती उछल-कूद करने को मिलेगी ये सब सोच ही रहे थे की इतने में बंदरो का सरदार बोला की कोई भी बदंर शहर में उछल-कूद नहीं करेगा। और न ही किसी भी वस्तु को छुएगा ये कहकर सभी बन्दर धीरे-धीरे शहर के अंदर जाने लगे इतने में एक शरारती बन्दर अपने सरदार और झुण्ड से नज़ारे चुरा कर भाग निकला और शहर में जाकर वह लोगों के बीच मौज-मस्ती करने लगा और लोगों का सामान चुरा कर खाने लगा। ये उसका प्रतिदिन का काम बन गया वह लोगों के बीच जाता और उनका सामान चुरा कर खा जाता ये सब करते हुए उसे बहुत मजा आता  एक दिन उसने देखा की शहर में मेला लगा हुआ हैं और वह पर तरह-तरह के पकवान बने हुए हैं और लोग पकवान की दुकान पर जा कर, टिक्की, चाट, समोसा, जलेबी, बर्फी, लड्डू, कबाब परेठा, सही पनीर, छोला, पानी पूरी आदि पकवान खा रहे हैं ये सब देख कर शरारती बन्दर के मुँह में पानी आ गया, अब उसे भी ये सब खाने की इच्छा हुई और वह बिना सोचे समझे लोगों के बीच जा पहुंचा और लोगों से छीन का कर उनका पकवान खाने लगा ये सब देख लोगों को बहुत गुस्सा आया और वे इस शरारती बन्दर को सबक सीखने के लिए उसे इट, पत्थर से मरने लागे और वह किसी तरह अपनी जान बचकर सर्कस में जा घुसा जहां पर बहुत सारे बंदर शरकस कर रहे थे, सर्कस में सभी बन्दर बारी-बारी से आग के जलते हुए गोले से कूद रहे थे।
ये सब देख कर वह बंदर भी बहुत ही उत्साहित हो गया और उसने बिना कुछ सोचे समझे आग के जलाते हुए गोले में छलांग लगा दी और वह बन्दर वही पर जल कर मर गया क्यों की उसे आग के गोले से निकलना नहीं आता था। 

कहानी की सीख- हमें कभी भी बिना सोचे समझे किसी भी कार्य को नहीं करना चाहिए, ओर ना ही किसी को देख कर कोई कार्य नहीं करना चाहिए। व्यर्थ का कार्य करने से जान भी जा सकती है। जैसे- शरारती बंदर ने दूसरे बंदरो को देख कर आग में छलांग लगा दी। 

सर्प और कौवे की कहानी (Panchtantra ki Kahani Hindi Story)

यह कहानी उस समय की हैं जब एक जंगल में एक कौवा अपने परिवार के साथ एक बहुत पुराने पेड़ के तने के अंदर अपना घर बना कर रहता था। और उस पेड़ के पास में एक दूसरा पेड़ था उस पेड़ के निचे एक चूहा बिल बनाकर रहता था। चूहा अपने बिल से निकल कर खाने की तलाश में बहार गया हुआ था तभी एक दुष्ट सर्प उसके बिल में आकर छिप गया और जब चूहा रात को अपने घर की और जा रहा था तभी उसको एक कौवा की आवाज सुनाई दी वह कुछ देर रुका और फिर अपने घर की ओर जाने लगा तभी उसको फिर से एक कौवा की आवाज सुनाई दी तो वह रुक गया और आस-पास देखने लगा तभी उसकी नजर एक झाड़ी पर पड़ी और जब चूहा झाड़ी की पास गया तो उसने देखा की एक कौवा झाड़ी में उलझ गया है और वह बहार नहीं निकल पा रहा था और कौवा जोर-जोर से चिल्ला रहा हैं, ये सब देख कर चूहा बोला की तुम घबराओ मत मैं तुम्हें इस झाड़ी से आजाद कर दूँगा। और चूहा उसकी तरफ बड़ा और झाड़ी को  अपने नुकीले दातो से कुतर डाला और कौवे को आजाद कर दिया। जब कौवा आजाद हो गया तो उसने चूहे से कहा की तुमने मेरी जान बचाई हैं आज से तुम मेरे सच्चे मित्र हो ये कहकर कौवा बादलों में उड़ने लगा ये देख कर चूहा बहुत ख़ुश हुआ और वह अपने घर की ओर जाने लगा, जब चूहा अपने घर पंहुचा तो उसने देखा की उसके बिल के पास सर्प के रेंगने के निशान बने हुए हैं ये सब देख कर चूहा समझ गया की उसके घर पर दुस्त सर्प ने अपना डेरा डाल लिया हैं। 
और चूहा जल्द ही अपनी जान बचाकर वह से भाग गया, और दूसरे पेड़ के नीचे जा कर बैठ गया और ज़ोर ज़ोर से रोने लगा तभी उस पेड़ पर बैठे कौवे को चूहे की आवाज सुनाई दी और वह तुरंत नीचे आ गया और चूहे को इस तरह रोते देख कौवे ने चूहे से पूछा ये मित्र तुम रो क्यों रहे हो, तो चूहे ने अपने कौवे दोस्त को सारी बात बता दी की उसके घर पर दुस्त सर्प ने अधिकार कर लिया है। ये सुन कर कौवे को बहुत गुस्सा आया और वह दुस्त सर्प को सबक सीखने के लिए सोचने लगा। 
जब सुबह हुई तो कौवे ने देखा की नदी के किनारे राजमहल के लोग नदी में नाहा रहे है ये देख कर कौवे ने सोचा की अगर मैं इन लोगों की सोने की चैन उठा कर चूहे के बिल में डाल दू तो ये लोग चैन पाने के लिए दुस्त सर्प को मर डालें गे ये कहकर कौवा जोर से उड़ा और सोने की चैन लेकर चूहे के बिल में डाल दिया ये सब नदी में नाहा रहे लोग देख रहे थे। 
ये देख कर लोगों कौवे को पकड़ने के लिए दौरे और चूहे के बिल के पास जा कर चूहे के बिल को खोदने लगे तभी उस बिल से दुस्त सर्प निकला और जोर -जोर से अपना फन मरने लगा ये सब देख कर लोग दर गए और दुस्त सर्प को वही पर मर डाला और अपनी सोने की चैन लेकर वापस अपने राजमहल वापस लौट गये। 
ये सब देख कर चूहा और कौवा बहुत खुश हुए और अपने अपने घर में फिर से रहने लगे। 

गौरैया और दुष्ट बन्दर की कहानी - पंचतंत्र (Panchtantra Ki Kahani Hindi story)

एक बहुत ही सुन्दर जंगल में एक गोरैया तथा उसका परिवार रहता था। उसने जंगल के सबसे पुराने वृक्ष की शाखाओं पर अपना घोंसला बनाया हुआ था। एक बार की बात हैं जब जंगल में बेहद बारिश हो रही थी। तभी न जाने कहा से एक बंदर उस वृक्ष के नीचे आकर बैठ गया जिस वृक्ष पर गोरैया ने अपना घोंसला बनाया हुआ था।
तेज बारिश की वजह से बंदर पूरी तरह से भीग चूका था और वह ठंड के मारे जोर-जोर से कप रहा था ये सब उस वृक्ष की शाख पर बैठी गोरैया देख रही थी। तभी गोरैया ने बंदर से कहा की तुम्हरे हाथ तो इंसान की तरह हैं और तुम्हारे पैर भी फिर भी तुम इस बारिश में भीग रहे हो क्या तुमने अपना घर नहीं बनाया हैं, क्या तुम्हारा परिवार नहीं हैं जो बिना घर के इधर उधर बरसात के मौसम में भाग रहे हो। जब बंदर ने ये बातें सुनी तो उसे बेहद गुस्सा आया और उसने गोरैया से कहा की तुम आप चुप हो जाओ नहीं तो तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा। 
ये सुनकर गोरैया ने कहा तुम्हारे जैसे बंदर के साथ ऐसा ही होना चाहिए अब तुम रात भर इस बरसत में भीगते रहो और ठंडी हवा में कांपते रहो। मेरा क्या मैं तो चली अपने घर में आराम से सोने ये सुन कर बंदर को बहुत गुस्सा आया और उसने वृक्ष की शाख पर चढ़ कर गोरैया का घोंसला अपने 
हाथो से नोच डाला ओर उखाड़ कर जमीन पर फैक दिया।
कहानी की सीख -हमें कभी भी दूसरे लोगों की बुराई नहीं करनी चाहिए, और मूर्ख व्यक्ति को भीना पूछे उसको ज्ञान नहीं देना चाहिए, ज्ञान  उसी व्यक्ति को देना चाहिए जो व्यक्ति बुद्धिमान् हो तभी आपके ज्ञान का वह सही से प्रयोग करेगा।

हंस का जोड़ा और कछुआ की दोस्ती (Panchtantra Ki Kahani Hindi story)

एक बार की बात है समुद्र में एक कछुआ रहता था और उसी समुद्र के किनारे एक हंस का जोड़ा भी रहता था। कछुआ और हंस में बहुत अच्छी दोस्ती थी क्यों की जब भी कछुआ को खेलने का मन होता वह समुद्र के किनारे चला जाता और दिन भर हंस के साथ खेलता रहता, कछुआ हंस के साथ खूब मौज मस्ती करता और हंस से देश दुनियाँ की बातें करता, कछुआ अपने दोस्त हंस से कहता की तुम तो आसमान में उड़ कर कहीं भी जा सकते हो और तुमने तो सारी दुनिया अपनी आँखो से देखी होगी। हंस हा में अपनी गर्दन को हिलता और कहता तुम भी कुछ कम नहीं हो समुद्र के अंदर रहते हो और सारे समुद्र की खूबसूरती को अपने आँखो से देखा और महसूस किया होगा। 
यही बातें वह रोज अपने दोस्त हंस से कहता था एक बार हंस का जोड़ा समुद्र के पास स्थित जंगल में गए, और आपस में बात करने लगे की कछुआ रोज हमसे देश दुनिया की बातें करता हैं क्यों न हम उसे अपने साथ लेकर आसमान की सैर कर लाये ये सुनकर दूसरा हंस बोला मैं भी अपने कछुआ दोस्त को आसमान में ले जाना चाहता हूँ पर वह हमारे साथ उड़ नहीं सकता हैं क्या करें। तभी दूसरे हंस ने कहा क्यों न हम उसे एक छोटी लकड़ी की मदत से अपने साथ लेकर आसमान में उड़ जाये। 
हम दोनों लकड़ी के दो सिरो को एक-एक करके अपनी चोंच में दबा ले और अगर कछुआ को बीच की लकड़ी पकड़ा दे तो हम उसे आसमान में लेकर उड़ सकते हैं। 
अगले दिन जब कछुआ अपने दोस्त से मिलने समुंद्र के किनारे गया तो हंस ने उसे कहा की आज हम पानी में नहीं खेलेंगे बल्कि आज हम तुम्हारे साथ देश दुनिया की सैर करेंगे। 
कछुआ बड़े आचर्य से पूछा कैसे तो हंस ने उसको लकड़ी वाली सारि बात बता दी और कछुआ  भी बिना सोचे समझे आसमान में उड़ने के लिए तैयार हो गया। 
तभी दूसरा हंस बोला तो फिर मैं अभी लकड़ी ले कर आता हूँ ये कहकर दूसरा हंस उड़ गया और समुन्द्र के पास स्थित जंगल में जाकर एक मझबूत लकड़ी अपनी चोंच से उठा लाया। 
अब हंस उसे लकड़ी की मदत से कछुआ को लेकर आसमान में उड़ने लगा। 
जब वह आसमान में बादलों के बीच से होकर गुजरा तो मनो कछुआ को ख़ुशी का ठिकाना न रहा और वह बदलो को इतने पास से देख कर बहुत खुश हुआ। अब हंस शहर की ओर लेकर जाने लगा हुआ तभी कछुआ की नजर एक पानी के फुहारें पर पड़ी ये देख कर कछुआ बहुत खुश हुआ और हंस से बोला रुको ये देखो ये कहते ही कछुआ की जमीन पर जा गिरा और वही पर मर गया। 
कहानी की सीख- हमे कभी भी बिना सोचे समझे कोई भी कार्य नहीं करना चाहिए, अगर हम किसी भी कार्य को बिना सोचे समझे करेगे तो हमरा हाल भी कछुआ की तरह होगा। जिसने बिना सोचे समझे आसमान में अपना मुँह खोल दिया जिससे उसकी लकड़ी छूट गई और वह जमीन पर गिर गया और वही पर मर गया। 

तीन मछलियां और एक मछुआरे की कहानी - पंचतंत्र (Panchtantra Ki Kahani Hindi story)

यह कहानी उन तीन मछलियों की हैं जिनके पास एक हजार बुद्धि तथा दूसरी मछली के पास दो हजार बुद्धि और तीसरी मछली के पास सौ बुद्धि थी। ये मछलियां घने जंगल के छोटे से तालाब में रहती थी और उसी तालाब में एक मेढ़क और एक केकड़ा भी रहता था, एक दिन की बात हैं जब सर्दियों का मौसम था और हल्की हल्की रिमझिम बारिस भी हो तभी रात के समय में तीनों मछलियां एक हजार बुद्धि, दो हजार बुद्धि और सौ बुद्धि पानी के ऊपर निकली और ज़ोर-ज़ोर से पानी में छलांग लगाने लगी तभी रात के समय में तालाब के पास स्थित रास्ते से दो मझुआरे गुजरे और जब उन्होंने आवाज सुनी तो वे तालाब के पास जा पहुंचे और उन्होंने देखा की तालाब में बहुत सारि मछलियां और केकड़े हैं जो बारिश होने की वजह से उछाल कूद रहे हैं तभी मछुआरे ने कहा की कल हम सुबह ही इन मछलियों को पकड़ने चले आएंगे ये दोनों मछुआरे आपस में बात कर रहे थे, इतने में एक मेढ़क आ गया और मछुआरे की सारी बातें सुन ली और जब मछुआरे वहाँ से चले गये तब मेढ़क ने तालाब में छलांग लगाई और तीनों मछलियों और केकड़े को बुलाकर मछुआरे की सारी बातें बता दी और कहां की कल मछुआरे इस तालाब में आएंगे और हम सबको पकड़ कर ले जायेगे, चालो हम सब रात में ही इस तालाब से भाग कर पास वाली झील में चले जाते हैं और जब सुबह मछुआरे हमें पकड़ने आएंगे तो उनको इस तालाब में कुछ नहीं मिलेगा और वे निराश होकर इस तालाब से चले जायेगे और फिर कभी भी इस तालाब पर नहीं आएंगे। 
ये मेढ़क की बातें सुन कर तीनों मछलियां ज़ोर-ज़ोर से हॅसने लगी और कहाँ मुर्ख मेढ़क तुझे ये नहीं हैं की हमारे पास दो हजार बुद्धि, एक हजार बुद्धि और सौ बुद्धि हैं वह मछुवारा हमें नहीं पकड़ पायेगा। 
ये कहकर तीनों मछलियाँ हसने लगी और मेढ़क से कहा तेरे पास तो एक ही बुद्धि हैं तू अपनी जान बचाकर यह से भाग जा ये बातें सुनकर मेढ़क बहुत दुःखी हुआ और धीमी स्वर में केकड़े से कहा की क्या तुम भी इस तालाब से नहीं जाओगे ये सुनकर केकड़े ने कहा जहां हमारे पास दो हजार, एक हजार और सौ बुद्धि वाली मछली हो तो हमें कैसा डर मैं तो यही पर अपनी तीन मछलियों के साथ रहुगा और तुम्हे जाना हो तो तुम चले जाओ मैं नहीं जाऊंगा ये सुनकर मेढ़क रात में ही पास वाली झील में चला गया। 
और जब सुबह हुई तो मेढ़क ने देखा की मछुआरें दो हजार बुद्धि तथा एक हजार बुद्धि वाली मछली को अपने कंधो पर लादा हुआ हैं और सौ बुद्धि वाली मछली को हाथ में पकड़ कर ले जा रहे हैं और केकड़े को 
जाल से बानी बोरी में बाधा हुआ है। 
ये सब देख कर मेढ़क बोला की सौ बुद्धि, एक हजार बुद्धि और दो हजार बुद्धि से अच्छी मेरी एक ही बुद्धि हैं और ये कहकर मेढ़क जोर जोर से हसने लगा। ये सब दूर से तीनों मछलियां देख और सुन रही थी। 

बगुला और सियार की कहानी - पंचतंत्र (Panchtantra Ki Kahani Hindi story)

किसी जंगल में एक अत्यधिक चतुर सियार रहता था। और उसी जंगल में एक चतुर बगुला भी रहता था। 
सियार अत्यधिक चतुर था। इसलिए वह दूसरे जनवरों को मूर्ख बनाकर उनका सारा खाना खा जाता था एक बार की बात हैं जब सियार जंगल में खाने की तलाश में इधर-उधर भटक रहा था तभी उसकी नजर के एक चतुर बगुले पर पड़ी और अब सियार मन ही मन सोचने लगा की इस बगुले को कैसे मुर्ख  बनाया जाये। तभी उसके दिमाग (मस्तिष्क) में एक विचार आया की क्यों न इस चतुर बगुला को अपने घर बुलाया जाये और इसे भी मुर्ख  बनाया जाये। 
यही सोचकर वह चतुर बगुला के पास गया और अपने घर आने के लिए उसे भोजन का न्योता दे दिया। 
भोजन का न्योता को स्वीकार करते हुए बगुला बोला धन्यवाद! सियार जी जो अपने मुझे भोजन पर आमंत्रित किया मैं अवश्य आऊंगा। ये कहकर बगुला अपने घर चला गया। 
अगले दिन जब बगुला भोजन का न्योता खाने के लिए सियार के घर गया तो सियार ने उसे एक पतली प्लेट में खाने के लिए दूध की खीर दी। और जब बगुला खीर खाने के लिए अपनी चोंच बढ़ाता तो उसकी चोंच प्लेट से टकरा जाती और वह खीर नहीं खा पता। 
बगुला ने खुद को बहुत अपमानित महसूस किया। वह समझ गया कि सियार ने उसको मुर्ख बनाने तथा उसका   मजाक उड़ाने के लिए ही उसे अपने घर भोजन पर बुलाया था। 
अंत में जब बगुला निराश होकर अपने घर लौटने लगा तो बगुले ने भी सियार को अपने यहां भोजन का न्योता दे दिया। 
ये सुनकर सियार खुशी से उछाल पड़ा और बगुले से कहा आपका बहुत बहुत धन्यवाद जो अपने मुझे अपने घर भोजन पर बुलाया। ये सुनकर बगुला बोला नहीं ये तो मेरा कर्तव्य हैं की मैं भी आपकी एक दिन मेहमान नवाजी करू। ये कहकर बगुला अपने घर चला गया। 

और जब अगले दिन सियार बगुले के घर भोजन खाने के लिए गया तो बगुले ने सियार का बहुत अच्छी तरह से स्वागत और मेहमान नवाजी किया और फिर सियार को खाने के लिए एक पतली और लम्बी सुरही में पीने के लिए स्वदिस्ट सुप दिया और खुद अपने लिए एक लम्बी सुरही में सुप ले आया और सियार से बोला सुप तो बहुत टेस्टी बना हैं। ये कहकर बगुला अपनी लम्बी चोंच सुरही में डाल कर  सुप पीने लगा। 
लेकिन जब सियार सुरही से सुप पिने की कोशिस करता तो सुरही का पतला मोहगड सियार के मुँह में फंस जाता जिससे सियार का मुँह सुप तक पहुँचता ही नहीं पता सुरही को देख कर वह सोचने लगा की कास इस सुरही का मोहगड बड़ा होता तो मैं इस सुरही से सुप पी पता। अब सियार को समझ आ गया था की उसने एक चतुर बगुले से पंगा ले लिया हैं।  उसे भी बगुला की तरह ही भूखा रहना पड़ा। इस प्रकार बगुला ने अपने अपमान का बदला ले लिया। 

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