जहाज में फ्रेंडशिप की कहानी | The Ship Of Friendship Story in Hindi

The Ship Of Friendship Story in Hindi

मेरे दादा जी कहते थे की उनके जवाने में एक फ्रेंडशिप जहाज होता था जिस पर चढ़कर कोई भी व्यक्ति किसी से भी सच्ची दोस्ती कर सकता था। 

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जब मेरी उम्र पांच साल की थी और मैं कक्षा एक में था तो मेरे दादा जी मुझे रोज़ शाम को लेटते समय फ्रेंडशिप जहाज की कहानियाँ सुनाया करते थे। 

दादा जी बताया करते थे की उन्होंने कैसे फ्रेंडशिप जहाज पर चढ़कर अपने लिए एक दोस्त खोजी जो उनके साथ दिन भर खेलती, हंसती, गुदगुदाती, भूख़  लगाने पर खाना खिलाती और माँ की तरह पूरा ख्याल रखती, दुःख दर्द होने पर मेरा हौसला बढ़ती। 

मेरे दादा जी कहते थे की उनकी दोस्त उनके साथ वह सब करती जो वह चाहते थे। उनकी दोस्त जीवन भर उनके साथ रही फिर न जाने क्या हुआ एक दिन की उनकी दोस्त उन्हे छोड़ कर कही चली गई। 

जब भी मेरे दादा जी थोड़ा ज्यादा उदास होते हैं तो यही कहानी मुझे सुनते हैं और फिर आंखो में आंसू लेकर कहते हैं क्या वह सब मेरा एक सपना था जो मेरी आंखों में आंसू देकर चला गया।

अब मेरे दादा जी इस दुनिया में नहीं हैं लेकिन उनकी यादें मुझे आज भी रुला देती हैं आज जब मुझे Ship Of Friendship Story का मतलब पता चला तो मेरी अंदर से एक ही आवाज निकली आई लव यू मेरे दादा जी शायद यह कहानी आपको ज्यादा अच्छी नहीं लगा रही होगी लेकिन यह सच हैं की मुझे इस कहनी से बहुत कुछ सीखने को मिला। 
इसलिए मैंने सोच क्यों न अपने दादा जी की कहानी आपके साथ मिलकर शेयर की जाए। जिसको पढ़कर आप भी कुछ नया सीखें। 

अब मैं अपने दादा जी की कहानी बताने जा रहा हूँ जो मुझे मेरे दादा जी सुनाया करते थे। 
यह कहानी उस समय की हैं जब किसी भी व्यक्ति के पास फोन, कम्प्युटर, डिजिटल प्रॉडक्ट नहीं हुआ करते थे। अब से लगभग 80 वर्ष पहले की कहानी हैं। 

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जब मेरे दादा जी कक्षा आठ में थे तो उन्होने अपने मित्र से किसी ऐसी लड़की के बारे में सुना था जो पढ़ने लिखने के साथ ही देखने में भी बहुत सुंदर थी। उस लड़की के पिता जी सरकारी ऑफिसर थे। और कुछ दिनों की छुट्टी लेकर गांव आये थे। 
दादा जी को जैसे ही पता चला वे देखने के लिए उतावले हो रहे थे, एक दिन दादा को कही से ख़बर मिली की शहर से आई हुई एक लड़की नदी में पड़ी छोटी सी ship (जहाज ) नव में खेल रही हैं। फिर क्या था मानो दादा जी की करोड़ों की लॉटरी लग गई हो इतने ख़ुश से दादा जी की उन्होने तुरंत स्कूल की खिरकी से अपना बस्ता किसी तरह से बाहर फैक और फिर स्कूल में कोई बहाना बनाकर कर किसी तरह से बाहर निकाल आए और स्कूल के पीछे जा कर अपना बस्ता उठा लिया और उस लड़की से मिलने पहुँच गए। नदी एक पास मेरा दादा जी वही पहली मुलाक़ात थी जिसे मेरे दादा जी फ्रेंडशिप वाला जहाज कहते थे।

मेरे दादा जी बहुत ही शर्मीले किस्म के व्यक्ति थे इसलिए उन्होने उस लड़की से कभी कहा ही नही की वह उससे जान से भी ज्यादा प्यार करते हैं। 

जब मेरे दादा जी पहली बार उस लड़की को नव पर देखा था तो मानो उन्होने विश्व की सबसे सुंदर कोई वस्तु देख ली हो, दादा जी उस लड़की को झड़ी के पीछे से बिना आँख की पलक झपकाए 10 मिनट तक देखते ही रहे।
न जाने कैसे उस लड़की को पता चल गया की कोई उसे झड़ी के पीछे से देख रहा हैं उस लड़की ने तुरंत आवाज लगाई और कहाँ तुम कौन हो जो मुझे इस तरह से छिप छिप कर देख रहे हो।

मेरे दादा जी बहुत ही शर्मिल थे इस लिए उन्होने धीमी आवाज में चुपके से बोले मैं हूँ केशव राव मैंने आपके बारे में अपने दोस्तों से सुना था इसलिए आपसे मिलने चला आया। लेकिन मेरी हिम्मत नहीं हो रही थी की आपसे बात कर सकु इसलिए मैं आपको झड़ी के पीछे से छिप छिप कर देख रहा था।

मेरे दादा ने इतने मीठे स्वर में उस लड़की से बोला की वह लड़की मेरे दादा से दोस्ती करने के लिए अपना हाथ आगे बड़ा दिया।

कुछ समय बाद मेरे दादा जी की दोस्ती इतनी ज्यादा गहरी हो गई की मेरा दादा उस लड़की से सच प्यार करने लगे। लेकिन मेरे दादा जी ने कभी भी उस लड़की से बोल नहीं पाये की मैं तुमसे प्यार करता हूँ।
मेरे दादा जी हमेश डरते थे की कई मेरे इन शब्दों को बोलने से मेरी दोस्ती भी टूट न जाए इसी डर से मेरे दादा ने कभी भी उस लड़की से अपने प्यार का इजहार नहीं कर पाये। 

मेरे दादा जी हमेश से एक ही बात सभी लोगो से कहते थे जो काम करना हो या जो बोलना हो उसे तुरंत बोल दो किसी का अच्छे समय का इंतज़ार मत करो क्यों की अच्छा समय तब होगा जब तुम उसको अपनी बात बोल दोगे।

तीन महीनों तक मेरे दादा जी उस लड़की से एक तरफा प्यार करते रहें फिर एक दिन मेरे दादा जी ने हिम्मत करी की आज उस लड़की से अपने दिल की बात कहा देगे। 

रात भर मेरे दादा ने सिर्फ इसी विषय के बारे में सोचते रहे की कल सुबह होते ही मैं उसे अपने दिल की बात कहा दूंगा। लेकिन सुबह उठाते ही मेरे दादा के मुंह से एक भी शब्द नहीं निकला जब उन्होने देखा की दादा जी के पिता जी बंदूक लेकर उनकी ही तरफ बढ़ते चले आ रहे हैं।

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अब मेरे दादा जी जो हिम्मत थी वह भी पूरी तरह से खत्म हो गई थी अब बस उनको ऐसा महाशूस हो रहा था जैसे उनके सपनों में किसी के आग लगा दी हो और मेरे दादा जी दुसर से उस जलती हुई आग को देख रहे थे।
मेरे दादा जी चाह कर भी ऐसा नहीं कर सकते थे क्यों की मेरे दादा के पिता जी बहुत ही गुस्सेल किस्म के इंसान थे और उन्हें छोटी बात पर गुस्सा आ जया करता था।

मेरे दादा जी का वह सपना कुछ दिनों में पूरा होने वाला था लेकिन ये सपना दिनों की छोड़ महीनों तथा इसके बाद सालों में बदल गया।

दादा जी के सामने ही उनकी दोस्त गाँव छोड़ कर अपने शहर चली गई, और मेरे दादा जी आज भी उसकी याद में रोते हैं।

कुछ ऐसी भी बातें हैं जो मैं लिख नहीं सकता क्यों की मेरे दादा जी उस लड़की से बहुत प्यार करते थे ये उनकी पहली मुलाक़ात थी।
जहाज़ में हुई थी मेरी पहली मुलाक़ात लेकिन उस मुलाक़ात के बाद मेरी किसी और से मुलाक़ात ही नहीं हुई।

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